गेहूं की फसल अब अपने अंतिम पड़ाव पर है और यही वह समय है जब आपकी थोड़ी सी मेहनत पैदावार में बड़ा अंतर ला सकती है। इस समय फसल तीन स्थितियों में हो सकती है: बालियां बन रही हैं, बालियां निकल चुकी हैं या दानों में दूध भरा जा रहा है। हाल के वर्षों में देखा गया है कि फरवरी-मार्च के दौरान अचानक तापमान बढ़ जाता है, जिससे दाने पूरी तरह नहीं भर पाते और फसल सूखने लगती है। इस ‘हीट स्ट्रेस’ से बचने के लिए सबसे जरूरी है कि आप अपनी फसल में नमी बनाए रखें। भारी पानी देने के बजाय, हल्का और बार-बार पानी दें, खासकर जब तेज हवा न चल रही हो, ताकि फसल गिरने से बची रहे।
फसल को गिरने से बचाने और दानों की गुणवत्ता सुधारने के लिए ‘पोटाश’ सबसे महत्वपूर्ण तत्व है। यदि आपकी फसल में बालियां अभी निकल रही हैं या गभोट (गोभ) की अवस्था में हैं, तो NPK 0:52:34 का 1 किलो प्रति एकड़ के हिसाब से स्प्रे करें। इसके साथ 100 ग्राम बोरोन मिलाना न भूलें, क्योंकि बोरोन बालियों को ऊपर से नीचे तक एक समान भरने में मदद करता है। लेकिन यदि बालियां पूरी तरह बाहर निकल चुकी हैं, तो आपको 0:52:34 की जगह NPK 0:0:50 (पोटेशियम सल्फेट) का इस्तेमाल करना चाहिए। यह दानों को वजनदार, मोटा और चमकदार बनाने के लिए सबसे प्रभावी है।
फसल की सेहत पर भी कड़ी नजर रखना इस समय अनिवार्य है। गेहूं में अक्सर ‘येलो रस्ट’ (पीला रतुआ) की समस्या आ जाती है। इसे पहचानने के लिए किसी भी पीले पत्ते को अपनी उंगलियों के बीच मसलें; यदि उंगली पर पीला पाउडर जैसा लगे, तो समझें कि रोग की शुरुआत हो चुकी है। ऐसी स्थिति में समय रहते टैबुकोनाज़ोल (Tebuconazole) आधारित किसी अच्छे फंगीसाइड का स्प्रे करें। ध्यान रहे कि फंगीसाइड का स्प्रे बालियां पूरी तरह पकने से पहले ही कर लें, अन्यथा बाद में इसका लाभ कम और नुकसान ज्यादा हो सकता है।
अंत में, यह बात गांठ बांध लें कि दानों के भराव के समय पानी बंद नहीं करना है। जब तक दाने सख्त न हो जाएं, खेत में नमी रहनी चाहिए, तभी आपको बंपर पैदावार मिलेगी। पोटाश का सही उपयोग न केवल दानों का आकार बढ़ाता है, बल्कि फसल की रोग प्रतिरोधक क्षमता को भी मजबूत करता है। इन छोटी-छोटी लेकिन वैज्ञानिक सावधानियों को अपनाकर आप अपने गेहूं की फसल को ‘सोने’ जैसा पीला और चमकदार बना सकते हैं।












